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Gita / Chapter 13.14
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् | सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति

Transliteration

sarvataḥ pāṇipādaṃ tatsarvato.akṣiśiromukham . sarvataḥ śrutimalloke sarvamāvṛtya tiṣṭhati

English

That (Knowable), which has hands and feet everwhere, which has eyes, heads and mouths everywhere, which has ears everywhere, exists in creatures by pervading them all.

Hindi

वह सब ओर हाथ-पैर वाला है और सब ओर से नेत्र, शिर और मुखवाला तथा सब ओर से श्रोत्रवाला है; वह जगत् में सबको व्याप्त करके स्थित है।।

Sanskrit
English
सर्वतः
everywhere
पाणिपादम्
with hands and feet
तत्
that
सर्वतः
everywhere
अक्षिशिरोमुखम्
with eyes
heads
and mouths
सर्वतः
everywhere
श्रुतिमत्
with ears
लोके
in the world
सर्वम्
all
आवृत्य
having enveloped
तिष्ठति
exists.
Hindi

सर्वत पाणिपादम् उत्तम अधिकारी तो आत्मा के निर्गुण स्वरूप को पहचान लेता है? परन्तु मध्यम अधिकारी को अज्ञात और अव्यक्त का बोध? ज्ञात और व्यक्त वस्तुओं के द्वारा कराने में सरलता होती है। यद्यपि प्रणियों के हाथ और पैर जड़ तत्त्व के बने हैं? तथापि वे चेतन और कार्यक्षम प्रतीत हो रहे हैं। इन सबके पीछे इन्हें चेतनता प्रदान करने वाला आत्मतत्त्व सर्वत्र एक ही है। इसीलिए यहाँ कहा गया है कि ब्रह्म समस्त हाथ और पैरों को धारण करने वाला है।इसी प्रकार? समस्त नेत्र? शिर और मुख भी इस चैतन्य के कारण ही