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Gita / Chapter 13.27
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् | क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ

Transliteration

yāvatsañjāyate kiñcitsattvaṃ sthāvarajaṅgamam . kṣetrakṣetrajñasaṃyogāttadviddhi bharatarṣabha

English

O scion of the Bharata dynasty, whatever object, moving or non-moving, comes into being, know that to be from the association of the field and the Knower of the field!

Hindi

हे भरत श्रेष्ठ ! यावन्मात्र जो कुछ भी स्थावर जंगम (चराचर) वस्तु उत्पन्न होती है, उस सबको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुई जानो।।

Sanskrit
English
यावत्
whatever
सञ्जायते
is born
किञ्चित्
any
सत्त्वम्
being
स्थावरजङ्गमम्
the unmoving and the moving
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्
from the union between the field and the knower of the field
तत्
that
विद्धि
know
भरतर्षभ
O best of the Bharatas.
Hindi

क्षेत्र (प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (पुरुष) इन दोनों में ही स्वतन्त्र रूप से कोई एक ही तत्त्व इस चराचर जगत् का कारण नहीं है। इन दोनों के संयोग से जगत् उत्पन्न होता है परन्तु इन दोनों का संयोग वास्तविक नहीं? वरन् अन्योन्य धर्म अध्यासरूप है।अध्यास की प्रक्रिया में विद्यमान अधिष्ठान पर भ्रान्ति से किसी अन्य वस्तु की ही कल्पना की जाती है? जैसे स्तम्भ में प्रेत का अध्यास। इस प्रकार के अध्यास में? भ्रान्त व्यक्ति स्तम्भ में वस्तुत अविद्यमान प्रेत के रूप? गुण और क्रियाओं को देखता है। यह स्तम्भ पर