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Gita / Chapter 15.11
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् | यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः

Transliteration

yatanto yoginaścainaṃ paśyantyātmanyavasthitam . yatanto.apyakṛtātmāno nainaṃ paśyantyacetasaḥ

English

And the yogis who are diligent see this one as existing in themselves. The non-discriminating ones who lack self-control do not see this one-though (they be) diligent.

Hindi

योगीजन प्रयत्न करते हुये ही अपने हृदय में स्थित आत्मा को देखते हैं, जब कि अशुद्ध अन्त:करण वाले (अकृतात्मान:) और अविवेकी (अचेतस:) लोग यत्न करते हुये भी इसे नहीं देखते हैं।।

Sanskrit
English
यतन्तः
striving (for perfection)
योगिनः
the Yogins
च
and
एनम्
this
पश्यन्ति
see
आत्मनि
in the Self
अवस्थितम्
dwelling
यतन्तः
striving
अपि
also
अकृतात्मानः
the unrefined
न
not
एनम्
this
पश्यन्ति
see
अचेतसः
unintelligent.
Hindi

जो साधक चित्त को एकाग्र करने तथा बुद्धि को कामनादि की निवृत्ति के द्वारा शुद्ध करने में सफल हो जाते हैं? केवल वे ही लोग आत्मा के वैभव को जान पाते हैं और इसके अनन्तत्व का अनुभव भी करते हैं। परन्तु यह भी सत्य है कि जो केवल यन्त्रवत् अत्यधिक साधना ही करते रहते हैं? यह आवश्यक नहीं कि उन्हें सफलता प्राप्त ही हो जाये। अनेक ऐसे साधक हैं? जिन्हें इस बात का दुख होता है कि वर्षों की उनकी नियमित साधना के होते हुये भी उनकी इच्छित प्रगति नहीं हुई है। इसका क्या कारण हो सकता है इस विवादास्पद प्रश्न क