Adiyogi Arts
ServicesResearchBlogVideosGitaPrayersEnter App
Gita / Chapter 15.17
← PrevNext →
Sanskrit
Hindi
Sanskrit

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युधाहृतः | यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः

Transliteration

uttamaḥ puruṣastvanyaḥ paramātmetyudhāhṛtaḥ . yo lokatrayamāviśya bibhartyavyaya īśvaraḥ

English

But different is th supreme Person who is spoken of as the transcendental Self, who, permeating the three worlds, upholds (them), and is the imperisahble God.

Hindi

परन्तु उत्तम पुरुष अन्य ही है, जो परमात्मा कहलाता है और जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण करने वाला अव्यय ईश्वर है।।

Sanskrit
English
उत्तमः
the Supreme
पुरुषः
Purusha
तु
but
अन्यः
another
परमात्मा
the highest
इति
thus
उदाहृतः
called
यः
who
लोकत्रयम्
the three worlds
आविश्य
pervading
बिभर्ति
sustains
अव्ययः
the indestructible
ईश्वरः
Lord.
Hindi

कोई एक व्यक्ति विभिन्न उपाधियों? व्यक्तियों? कार्यों और पदों की दृष्टि से विभिन्न नामों से संबोधित किया जाता है और यदि इन आपेक्षिक दृष्टिकोणों को दूर कर दिया जाय? तो वह व्यक्ति शून्य रूप नहीं हो जायेगा। वह मात्र एक निर्विशेष व्यक्ति रह जाता है। इसी प्रकार? जो परम तत्त्व नित्यपरिवर्तनशील जगत् के रूप में क्षर पुरुष कहलाता है और क्षर के ज्ञाता के रूप में अक्षर पुरुष? वह स्वयं इन दोनों से भिन्न ही है? जिसे यहाँ उत्तम पुरुष? परमात्मा और अव्यय ईश्वर कहा गया है।क्षर से परे पहुँचने पर अक्षर ही