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Gita / Chapter 17.11
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

अफलाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते | यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः

Transliteration

aphalāṅkṣibhiryajño vidhidṛṣṭo ya ijyate . yaṣṭavyameveti manaḥ samādhāya sa sāttvikaḥ

English

That sacrifice which is in accordance with the injunctions, (and is) performed by persons who do not hanker after results, and with the mental conviction that it is surely obligatory, is done through sattva.

Hindi

जो यज्ञ शास्त्रविधि से नियन्त्रित किया हुआ तथा जिसे “यह मेरा कर्तव्य है” ऐसा मन का समाधान (निश्चय) कर फल की आकांक्षा नहीं रखने वाले लोगों के द्वारा किया जाता है, वह यज्ञ सात्त्विक है।।

Sanskrit
English
अफलाकाङ्क्षिभिः
by men desiring no fruit
यज्ञः
sacrifice
विधिदृष्टः
as enjoined by the ordinance
यः
which
इज्यते
is offered
यष्टव्यम्
ought to be offered
एव
only
इति
thus
मनः
the mind
समाधाय
having fixed
सः
that
सात्त्विकः
Sattvic or pure.
Hindi

प्रस्तुत खण्ड में यह दर्शाया गया है कि किस प्रकार मनुष्यों के कर्मों में भी उसके स्वभाव की सुरूपता और कुरूपता स्पष्ट होती है।अफलाकांक्षिभि सात्त्विक पुरुषों के यज्ञ कर्म सदैव फलासक्ति से रहित और निस्वार्थ भाव से किये जाते हैं। फल की प्राप्ति भविष्य में ही होती है? और इसलिए वर्तमान समय में उनकी चिन्ता करने में अपनी क्षमताओं को क्षीण करना अविवेक का ही लक्षण है।शास्त्रविधि से नियत किया हुआ वेदों में कर्मों का वर्गीकरण चार भागों में किया गया है। (1) काम्य कर्म अर्थात् व्यक्तिगत लाभ को ल