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Gita / Chapter 18.17
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते | हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते

Transliteration

yasya nāhaṃkṛto bhāvo buddhiryasya na lipyate . hatvā.api sa imā.Nllokānna hanti na nibadhyate

English

He who has not the feeling of egoism, whose intellect is not tainted, he does not kill, nor does he become bound-even by killing these creatures!

Hindi

जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है।।

Sanskrit
English
यस्य
whose
न
not
अहंकृतः
egoistic
भावः
the notion
बुद्धिः
intelligence
यस्य
of whom
न
not
लिप्यते
is tainted
हत्वा
having slain
अपि
even
सः
he
इमान्
these
लोकान्
people
न
not
हन्ति
slays
न
not
निबध्यते
is bound.
Hindi

कर्म का नियम यह है कि जो कर्म का कर्ता होता है वही फल का भोक्ता भी होता है। हम यह देख चुके हैं कि केवल जड़ उपाधियाँ कर्म नहीं कर सकतीं और न केवल चैतन्य स्वरूप आत्मा ही कर्ता हो सकता है। दोनों के परस्पर सम्बन्ध से कर्ताभिमानी जीव केवल अविद्या से ही उत्पन्न हो सकता है क्योंकि परस्पर विरोधी धर्मी जड़ उपाधि और चेतन आत्मा के मध्य कोई वास्तविक सम्बन्ध नहीं हो सकता। अत स्पष्ट है कि आत्मा को न जानकर अनात्मा के सम्बन्ध से जीव भाव को प्राप्त होकर मनुष्य शुभाशुभ कर्मों का कर्ता बनता है और उसकी बु