Adiyogi Arts
ServicesResearchBlogVideosGitaPrayersEnter App
Gita / Chapter 18.55
← PrevNext →
Sanskrit
Hindi
Sanskrit

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः | ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्

Transliteration

bhaktyā māmabhijānāti yāvānyaścāsmi tattvataḥ . tato māṃ tattvato jñātvā viśate tadanantaram

English

Through devotion he knows Me in reality, as to what and who I am. Then, having known Me in truth, he enters (into Me) immediately after that (Knowledge).

Hindi

(उस परा) भक्ति के द्वारा मुझे वह तत्त्वत: जानता है कि मैं कितना (व्यापक) हूँ तथा मैं क्या हूँ। (इस प्रकार) तत्त्वत: जानने के पश्चात् तत्काल ही वह मुझमें प्रवेश कर जाता है, अर्थात् मत्स्वरूप बन जाता है।।

Sanskrit
English
भक्त्या
by devotion
माम्
Me
अभिजानाति (he)
knows
यावान्
what
यः
who
च
and
अस्मि (I)
am
तत्त्वतः
in truth
ततः
then
माम्
Me
तत्त्वतः
in truth
ज्ञात्वा
having known
विशते (he)
enters
तत्
that
अनन्तरम्
afterwards.
Hindi

परमात्मा से परम प्रेम अर्थात् पूर्ण तादात्म्य ही परा भक्ति है। उस परा भक्ति से ही साधक भक्त परमात्मा को तत्त्वत समझ सकता है। शास्त्र के श्रवण? अध्ययन आदि से प्राप्त किया गया ज्ञान प्राय परोक्ष होता है। जब वह ज्ञान? विज्ञान अर्थात् स्वानुभव बन जाता है? केवल तभी परमात्मा का यथार्थ बोध होता है।यावान् (मैं कितना हूँ) इसका अर्थ यह है कि परा भक्ति के द्वारा एक भक्त भगवान् के उपाधिकृत विस्तार को समझ लेता है। भगवान् की विभूतियों का वर्णन दसवें अध्याय में किया जा चुका है।यश्च अस्मि (मैं क्या ह