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Gita / Chapter 7.25
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः | मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्

Transliteration

nāhaṃ prakāśaḥ sarvasya yogamāyāsamāvṛtaḥ . mūḍho.ayaṃ nābhijānāti loko māmajamavyayam

English

Being enveloped by yoga-maya, I do not become manifest to all. This deluded world does not know Me who am birthless and undecaying.

Hindi

अपनी योगमाया से आवृत्त मैं सबको प्रत्यक्ष नहीं होता हूँ। यह मोहित लोक (मनुष्य) मुझ जन्मरहित, अविनाशी को नहीं जानता है।।

Sanskrit
English
न
not
अहम्
I
प्रकाशः
manifest
सर्वस्य
of all
योगमायासमावृतः
veiled by YogaMaya
मूढः
deluded
अयम्
this
न
not
अभिजानाति
knows
लोकः
world
माम्
Me
अजम्
unborn
अव्ययम्
imperishable.
Hindi

यदि समस्त जगत् के अधिष्ठान के रूप में कोई दिव्य तत्त्व विद्यमान है तो फिर क्या कारण है कि सब लोगों के द्वारा सर्वत्र सदा वह अनुभव नहीं किया जाता क्यों हम परिच्छिन्न जीव के समान व्यवहार करते हैं और अपने अनन्त स्वरूप को पहचान नहीं पाते संक्षेप में मुझमें और मेरे स्वरूप के मध्य कौन सा आवरण पड़ा हुआ है जब जिज्ञासु साधकगण वेदान्त प्रतिपादित सिद्धांतों का अध्ययन करते हैं तो स्वाभाविक ही उनके मन में इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं।भगवान् कहते हैं यह मोहित जगत् मुझ अजन्मा अविनाशी को नहीं जानता ह