Adiyogi Arts
ServicesResearchBlogVideosGitaPrayersEnter App
Gita / Chapter 8.22
← PrevNext →
Sanskrit
Hindi
Sanskrit

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया | यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्

Transliteration

puruṣaḥ sa paraḥ pārtha bhaktyā labhyastvananyayā . yasyāntaḥsthāni bhūtāni yena sarvamidaṃ tatam

English

O son of Prtha, that supreme Person-in whom are included (all) the beings and by whom all this is pervaded-is, indeed, reached through one-pointed devotion.

Hindi

हे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है।।

Sanskrit
English
पुरुषः
Purusha
सः
that
परः
highest
पार्थ
O Partha
भक्त्या
by devotion
लभ्यः
is attainable
तु
verily
अनन्यया
without another object (unswerving)
यस्य
of whom
अन्तःस्थानि
dwelling within
भूतानि
beings
येन
by whom
सर्वम्
all
इदम्
this
ततम्
pervaded.
Hindi

हिन्दुओं के उपदेष्टा भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ उस साधन मार्ग को बताते हैं जिसके द्वारा उस परम पुरुष को प्राप्त किया जा सकता है जिसे अव्यक्त अक्षर कहा गया था। वह साधन मार्ग है अनन्य भक्ति। परम पुरुष से भक्ति (निष्काम परम प्रेम) तभी वास्तविक और पूर्ण हो सकती है जब साधक भक्त स्वयं को शरीर मन और बुद्धि द्वारा अनुभूयमान जगत् से विरत और वियुक्त करना सीख लेता है। नित्य पारमार्थिक सत्य से प्रेम ही वह साधन है जिसके द्वारा मिथ्या वस्तु से वैराग्य होता है। प्रखर जिज्ञासा से अनुप्राणित हुई आत्मतत्त्व