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Gita / Chapter 13.17
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् | भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च

Transliteration

avibhaktaṃ ca bhūteṣu vibhaktamiva ca sthitam . bhūtabhartṛ ca tajjñeyaṃ grasiṣṇu prabhaviṣṇu ca

English

And the Knowable, though undivided, appears to be existing as divided in all beings, and It is the sustainer of all beings as also the devourer and originator.

Hindi

और वह अविभक्त है, तथापि वह भूतों में विभक्त के समान स्थित है। वह ज्ञेय ब्रह्म भूतमात्र का भर्ता, संहारकर्ता और उत्पत्ति कर्ता है।।

Sanskrit
English
अविभक्तम्
undivided
च
and
भूतेषु
in beings
विभक्तम्
divided
इव
as if
च
and
स्थितम्
existing
भूतभर्तृ
the supporter of beings
च
and
तत्
That ज्ञेयम् to be known
ग्रसिष्णु
devouring
प्रभविष्णु
generating
च
and.
Hindi

यद्यपि विद्युत् सर्वत्र विद्यमान है? तथापि प्रकाश के रूप में वह केवल बल्ब में ही प्रकट होती है। उसी प्रकार आत्मा सर्वगत होते हुए भी जहाँ उपाधियाँ हैं वहीं पर विशेष रूप से प्रकट होता है। एक ही व्यापक आकाश घट और मठ की उपाधियों से घटाकाश और मठाकाश के रूप में प्रतीत होता है।पूर्व के अध्यायों में भी अनेक स्थलों पर वर्णन किया जा चुका है कि किस प्रकार विश्वाधिष्ठान परमात्मा विश्व की उत्पत्ति? स्थिति और संहार का कर्ता है। यहाँ मिट्टी? स्वर्ण? समुद्र और जाग्रतअवस्था के मन के दृष्टान्त स्मरणीय ह