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Gita / Chapter 16.20
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि | मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्

Transliteration

āsurīṃ yonimāpannā mūḍhā janmani janmani . māmaprāpyaiva kaunteya tato yāntyadhamāṃ gatim

English

Being born among the demoniacal species in births after births, the foods, without ever reaching Me, O son of Kunti, attain conditions lower than that.

Hindi

हे कौन्तेय ! वे मूढ़ पुरुष जन्मजन्मान्तर में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं और ( इस प्रकार) मुझे प्राप्त न होकर अधम गति को प्राप्त होते है।।

Sanskrit
English
असुरीम्
demoniacal
योनिम्
womb
आपन्नाः
entering into
मूढाः
deluded
जन्मनि जन्मनि
in birth after birth
माम्
Me
अप्राप्य
not attaining
एव
still
कौन्तेय
O son of Kunti (Arjuna)
ततः
than that
यान्ति (they)
fall into
अधमाम्
lower
गतिम्
condition (path or goal).
Hindi

इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि जब तक मनुष्य अपनी आसुरी प्रवृत्तियों के वश में उनका दास बना रहता है तब तक वह उसी प्रकार के हीन जन्मों को प्राप्त होता रहता है। वह आत्मा के परमानन्द स्वरूप का अनुभव नहीं कर पाता है।अब तक दैवी और आसुरी सम्पदाओं का स्पष्ट एवं विस्तृत विवेचन किया गया है। बहुसंख्यक लोगों की न्यूनाधिक मात्रा में असुरों की श्रेणी में ही गणना की जा सकती है। परन्तु एक आध्यात्मिक साधक को केवल ऐसे वर्णनों से सन्तोष नहीं होता। वह अपनी पतित अवस्था से स्वयं का उद्धार करना चाहता है। अत?