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Gita / Chapter 2.70
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् | तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी

Transliteration

āpūryamāṇamacalapratiṣṭhaṃ samudramāpaḥ praviśanti yadvat . tadvatkāmā yaṃ praviśanti sarve sa śāntimāpnoti na kāmakāmī

English

That man attains peace into whom all desires enter in the same way as the waters flow into a sea that remains unchanged (even) when being filled up from all sides. Not so one who is desirous of objects.

Hindi

जैसे सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में (अनेक नदियों के) जल (उसे विचलित किये बिना) समा जाते हैं? वैसे ही जिस पुरुष के प्रति कामनाओं के विषय उसमें (विकार उत्पन्न किये बिना) समा जाते हैं? वह पुरुष शान्ति प्राप्त करता है? न कि भोगों की कामना करने वाला पुरुष।।

Sanskrit
English
आपूर्यमाणम्
filled from all sides
अचलप्रतिष्ठम्
based in stillness
समुद्रम्
ocean
आपः
water
प्रविशन्ति
enter
यद्वत्
as
तद्वत्
so
कामाः
desires
यम्
whom
प्रविशन्ति
enter
सर्वे
all
सः
he
शान्तिम्
peace
आप्नोति
attains
न
not
कामकामी
desirer of desires.
Hindi

यह सुविदित तथ्य है कि यद्यपि करोड़ों गैलन पानी अनेक सरिताओं द्वारा विभिन्न दिशाओं से आकर निरन्तर समुद्र में समाता रहता है तथापि समुद्र की मर्यादा किसी प्रकार भंग नहीं होती। इसी प्रकार ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से असंख्य विषय संवेदनाएँ ज्ञानी पुरुष के मन में पहुँचती रहती हैं फिर भी वे उसके अन्तकरण में किसी प्रकार का भी विकार अथवा क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सकतीं।विषयों के बीच रहता हुआ इन्द्रियों के द्वारा समस्त व्यवहार करता हुआ भी जो पुरुष स्वस्वरूप की स्थिति से विचलित नहीं होता वही ज्ञानी है