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Gita / Chapter 4.35
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव | येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि (var अशेषाणि)

Transliteration

yajjñātvā na punarmohamevaṃ yāsyasi pāṇḍava . yena bhūtānyaśeṣāṇi drakṣyasyātmanyatho mayi

English

Knowing which, O Pandava (Arjuna), you will not come under delusion again in this way, and through which you will see all beings without exception in the Self and also in Me.

Hindi

जिसको जानकर तुम पुन इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगे,  और हे पाण्डव ! जिसके द्वारा तुम भूतमात्र को अपने आत्मस्वरूप में तथा मुझमें भी देखोगे।।

Sanskrit
English
यत्
which
ज्ञात्वा
having known
न
not
पुनः
again
मोहम्
delusion
एवम्
thus
यास्यसि
will get
पाण्डव
O Pandava
येन
by this
भूतानि
beings
अशेषेण
all
द्रक्ष्यसि (thou)
shalt see
आत्मनि
in (thy) Self
अथो
also
मयि
in Me.
Hindi

इस प्रकरण के संदर्भ किसी के मन में यह शंका उठ सकती है कि इतना अधिक परिश्रम करके ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है परन्तु हो सकता है कि मृत्यु के पश्चात् फिर हम उसी अज्ञान अवस्था को पुन प्राप्त हो जायें। अपने एक ही जीवन में हम अनेक प्रकार के ज्ञान प्राप्त करते हैं लेकिन सब का ही हमें स्मरण नहीं रहता। इसी प्रकार आत्मज्ञान को भी प्राप्त करके यदि उसका विस्मरण हो जाता है तब तो वास्तव में बड़ी ही हानि होगी।इस प्रकार की शंका का निवारण करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण निश्चयपूर्वक कहते हैं इसे जानकर पुन त