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Gita / Chapter 6.35
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

श्रीभगवानुवाच | असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् | अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते

Transliteration

śrībhagavānuvāca . asaṃśayaṃ mahābāho mano durnigrahaṃ calam . abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate

English

The Blessed Lord said O mighty-armed one, undoubtedly the mind is untractable and restless. But, O son of Kunti, it is brought under control through practice and detachment.

Hindi

श्रीभगवान् कहते हैं —  हे महबाहो ! नि:सन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है; परन्तु, हे कुन्तीपुत्र ! उसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में किया जा सकता है।।

Sanskrit
English
असंशयम्
undoubtedly
महाबाहो
O mightyarmed
मनः
the mind
दुर्निग्रहम्
difficult to control
चलम्
restless
अभ्यासेन
by practice
तु
but
कौन्तेय
O Kaunteya
वैराग्येण
by dispassion
च
and
गृह्यते
is restrained.
Hindi

भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को पूर्णरूप से जानते थे वह एक वीर योद्धा कर्मशील साहसी और यथार्थवादी पुरुष था। ऐसे असामान्य व्यक्तित्व का पुरुष जब गुरु के उपदिष्ट तत्त्वज्ञान से सहमत होकर उसकी सत्यता या व्यावहारिकता के विषय में सन्देह करता है तब गुरु में भी मन के सन्तुलन तथा शिष्य की विद्रोही बुद्धि को समझने और समझाने की असाधारण क्षमता का होना आवश्यक होता है। गीता में इस स्थान पर संक्षेप में स्थिति यह है कि भगवान् के उपदेशानुसार मन के स्थिर होने पर आत्मानुभूति होती है जबकि अर्जुन का कहना है कि